भारत की सतियाँ
भारत की सतियाँ
भारत की इस पुण्यधरा को नमन करूँ मैं बारम्बार
जग को पतिव्रत पाठ पढ़ाने जहाँ सती लेती अवतार
एकनिष्ठ होकर जो जीती करती संयम का व्यवहार
सपने में भी पर नर का जो करती है न कभी विचार
डोला करते जिनके तप से देवों के भी है दरबार
जिनकी आभा के समक्ष है फीका सारा यह संसार
धर्मनिष्ठ अरु पावनता से सृष्टि हेतु बनी मिसाल
'नील' आज उनकी महिमा गा करने आया तुम्हें निहाल
प्रातकाल जिनके वंदन से हो जाता है दिवस महान
आओ मिलकर उन सतियों का करे प्रशस्ति का जयगान
प्रथम नमन माँ अनुसुइया को पतिव्रत का जो है प्रतिमान
सतियों में है अग्रगण्य जो दुर्वासा उनकी संतान
एक बार तीनों देवी में हुआ परस्पर यह संवाद
सती कौन है बड़ी जगत में छिड़ा हुआ था यही विवाद
नारद जी ने अनुसइया का आकर के तब किया बखान
हरिहर संग ब्रम्हा बन ब्राम्हण आये उनसे लेने दान
कहा सती से दान हमें दो ब्राम्हण का धरके सब वेश
मगर स्वीकारेंगे तब ही हम जब तन पर न वस्त्र हो शेष
तीन देव को बना शिशु तब दिया आपने भिक्षादान
जगती में माँ सती आपने पाया है अनुपम स्थान
माँ सीता को पतिव्रत का था दिया आपने ही उपदेश
दिव्य दिया परिधान उन्हें था आल्हादित पा हुई मिथलेश
द्वितीय नमन माँ सावित्री को सत्यवान पति का था नाम
वापस लाकर यम से पति को पाया है अद्भुत स्थान
वट सावित्री व्रत का तब से जग ने जाना पावन नाम
वय में पति के वृद्धि करता पूर्ण करे यह सारे काम
तृतीय नमन है मंदोदरी को रावणप्रिया भले थी आप
धर्मपरायण रही सदा ही किया कभी न कोई पाप
बार-बार बोली रावण को लौटा दो रघुवर का मान
काल मगर था उसके सिरपर हुआ उसे न् किंचित भान
खेल दिया शतरंज विश्व को विविध किये थे आविष्कार
कला पारंगत खान गुणों की पति के बल का थी आधार
चौथा वंदन पांचाली को पांडव शक्ति का थी मूल
चिरकुमारी वह कहलाई नाम नही जाना तुम भूल
द्रुपदसुता गौरव भारत की देवी की जो थी पर्याय
मर्यादा अरु प्रण का जिनका पढ़ती है दुनिया अध्याय
ततपरता में पूर्व जन्म में माँगा शिव से था वरदान
पांच पांडवों की सैरंध्री इसीलिए वह हुई महान
जीत स्वयंवर अर्जुन ने दिया मातु को यह संदेश
किया भूल कुंती माँ ने तब कहा बाँट लो बिना क्लेश
प्रश्न उठा कैसे कर बाँटे नारी है यह नही अनाज
पड़ा पाप होगा माता यह कैसे कर पाएंगे काज
किन्तु वचन कुंती का रखने सबने ही मानी यह बात
सैरंध्री ने पाँचो संग में लिए अग्नि के फेरे सात
केश पकड़ दुशासन ने जब पांचाली को लाया खींच
चीर खींचने को उद्धत हो लगा सभा के बिल्कुल बीच
चीर बचाने अपनो मे से कोई भी न आया साथ
तब उनने श्री गिरिधारी से अनुनय किया जोड़कर हाथ
मौन रहे जब भरतवंश के सारे के सारे बलवान
चीर बचाने को उनका तब प्रकट हुए श्री हरि भगवान
नमन करूँ मैं पंचम उनको सुलोचना जो है कहलाय
लिख-लिख महिमा कलम थके न लिखकर यह पुलकित हो जाय
रक्षवंश की बहू आप थी इंद्रजीत की थी मनमीत
सतीबल से ना मेघनाथ को नही सका था कोई जीत
दैवीगुण से परिपूर्ण थी सतगुण का वह थी भंडार
कन्या नाग वासुकी की थी उन्नत उनके थे संसार
मेंघनाथ का लखनलाल ने बाणों से जब काटा शीश
किया याचना राम से इनने शीश पति का दो जगदीश
किया समर्पित पति संग में अग्नि को था अपना देह
वर्णन करते झरते आँसू पतिव्रता का पावन स्नेह
पदमावत हाडा़रानी डिम्पल चीमा कितने दृष्टांत
रहा सदा सतियों से हरदम भारत भू अपना सम्भ्रांत
आंच कभी मिट्टी पर आती देती आई अपना त्याग
इनके त्याग तेज से गाता भारत अपना जीवन राग
जय जय जय सतियों की बोलो मिलकर सारे सकल समाज
विश्व में विस्तृत वैभव वसुधा का जिसके बल से है आज
सुनिल शर्मा नील
वीररस कवि छत्तीसगढ़
8839740208
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