पंजाब परिदृश्य पर शेर के भी दाँत गिन सकते है जो कि बन्धु बिल्ली की वो म्याऊँ से कहो भला डरेंगे क्या छप्पन भोगों के स्वाद भाते जिसको कभी वो घोड़े की तरह बोलो घास को चरेंगे क्या बात यह कोई समझाए मुझे इतनी सी अमृत को पीकर कभी कोई मरेंगे क्या चंद्र-अंतरिक्ष नाप चुके हो जो कदमों से चूहे बिल्ली वाले खेल गुंडे से करेंगे क्या || सुनिल शर्मा नील छत्तीसगढ़ 8839740208
संस्मरण अपन अपन होथे नवा घर कहिथे बनाके देख अउ बिहाव कहिथे करके देख | ये गोठ ला सियान मन कहे हे तेन कतका सही हे अपन अनुभव ले जाने बर मिलिस |नवा घर जब जनवरी दू हजार बाइस(जनवरी 2022मा बनवाएव) ता कब खर्चा हा 20 लाख ले बाढ़त-बाढ़त 30 लाख पहुँचगे पता नई चलिस |एक बेर बनवाना हे इहु कर लेथन उहु लगवा लेतेन करत-करत कब घर के खर्चा बाढ़गे पता नई चलिस कर्जा मूड़ी मा चढ़गे रहिसे | रोज रतिहा जब सोवव ता कर्जा के आंकड़ा मन लेनदार मन आँखी मा झूलय |का करहू कइसे करहू अइसन लगे | लइका कतको बड़ हो जावय दाई बाबू बर सदा नान्हे अउ मयारू रहिथे |मैं घर के चार भाई मन मा सबले नान्हे आवव मोर मया कतका होही समझ सकत होहू |जब भी थक जथँव माँ के कोरा मा जाके सुत जथव |अइसे लगथे जइसे अब सब सुग्घर हो जाहि |एकदिन जाके माँ होरा खावत बरवट मा बइठे रहय मैं जाके ओखर कोरा मा मूड़ी रखके ढलँग गेंव |फेर दाई-दाई होथे मोर चिंता भरे मुह ला देखके समझगे बिन बोले सबगोठ ला जनामना जानगे मोर मुहू ला देखके पूछिस-कस बेटा का सोंचत हस ,अड़बड़ चिंता मा दिखत हस बेटा | मैं कहेव माँ एकझन लागादार के पैसा लागत हव |मोला तगादा के आदत नइहे माँ |इस्कूल के ...
(( आज का अमृत ज्ञान )) *रावण ने कैलाश पर्वत को उठा लिया फिर धनुष क्यों नहीं उठा पाया और श्री राम ने कैसे धनुष तोड़ दिया ?* ऐसा था धनुष : भगवान शिव का धनुष बहुत ही शक्तिशाली और चमत्कारिक था। शिव ने जिस धनुष को बनाया था उसकी टंकार से ही बादल फट जाते थे और पर्वत हिलने लगते थे। ऐसा लगता था मानो भूकंप आ गया हो।यह धनुष बहुत ही शक्तिशाली था।इसी के एक तीर से त्रिपुरासुर की तीनों नगरियों को ध्वस्त कर दिया गया था। इस धनुष का नाम पिनाक था।देवी और देवताओं के काल की समाप्ति के बाद इस धनुष को देवराज इन्द्र को सौंप दिया गया था। देवताओं ने राजा जनक के पूर्वज देवराज को दे दिया।राजा जनक के पूर्वजों में निमि के ज्येष्ठ पुत्र देवराज थे।शिव-धनुष उन्हीं की धरोहरस्वरूप राजा जनक के पास सुरक्षित था।उनके इस विशालकाय धनुष को कोई भी उठाने की क्षमता नहीं रखता था, लेकिन भगवान राम ने इसे उठाकर इसकी प्रत्यंचा चढ़ाई और इसे एक झटके में तोड़ दिया। श्रीराम चरितमानस में एक चौपाई आती है:- *"उठहु राम भंजहु भव चापा।* *मेटहु तात जनक परितापाI"* भावार्थ- गुरु विश्वामित्र जनकजी को बेहद ...